मानो या ना मानो : वृन्दावन में स्थित निधि वन का अनूठा रहस्य

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 निधि-वन-का-अनूठा-रहस्य

भारत में अनेक ऐसे स्थान हैं जो अपने दामन में ऐसे कई रहस्यों को समेटे हुए है, जिनपर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल होता है पर अगर हम उन जगहों पर जाएँ तो हम उन रहस्यों का अनुभव कर सकते हैं। कई जगहों पर वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये तो थोड़ा मुश्किल होता है उन बातों को मानना, परन्तु भारत में आस्था कहीं ना कहीं विज्ञान पर हावी पड़ ही जाती है।

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हमारे भारत देश में अनेक ऐसे मंदिर हैं जिनके बारे में अगर पढ़ा जाये तो कुछ ऐसी रहस्यमयी बातें जानने को मिलेंगी, की आप आश्चर्य ही करते रह जाएंगे, कि क्या ऐसा हो सकता है? अगर हो सकता है तो कैसे?

भारत के मंदिर अपनी कथाओं के लिए पुरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। हर वर्ष लाखों विदेशी यात्री यहां के मंदिरों के दर्शन के लिए आते और जब वो उन रहस्यों, कथाओं को सुनते तो वो भी हतप्रभ रह जाते।

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आज हम भारत के जिस स्थान की बात करने जा रहे, वो है हमारे मनमोहन कान्हा की नगरी वृन्दावन, जहां अगर आप एकबार चले गए तो फिर आप शायद ही वापिस आ पाएं, क्योंकि ये हमारे बांके बिहारी की नगरी है। जिनकी एक मुस्कान आपको मंत्रमुग्ध कर देगी और आप बस राधे राधे ही करते रह जाएंगे।

तो चलिए वृन्दावन में स्थित निधिवन के रहस्य के बारे में जानते हैं,

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“कहा जाता है कि वृन्दावन में निधिवन एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा रानी आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं।
रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं।”

है ना आश्चर्यचकित करने वाला, तो क्या हमारे कान्हा आज भी राधा रानी के साथ रास रचाने पृथ्वी पर स्थित निधिवन में आते हैं?

आइये थोड़ा और विस्तार से जानते हैं।

वृन्दावन मथुरा क्षेत्र में स्थित एक गांव है जो भगवान श्रीकृष्ण की लीला से जुडा है। इस स्थान को श्री कृष्ण भगवान के बाल लीलाओं के स्थान के रूप में जाना जाता है। यह मथुरा से १५ किमी कि दूरी पर स्थित है। वृन्दावन में श्री कृष्ण और राधा रानी के मन्दिरों की विशाल संख्या है। इसी वृन्दावन में निधिवन स्थित है, जहां श्री कृष्ण अपनी राधा रानी और गोपियों के संग रासलीला करते थे।


कहते हैं कि यह स्थान श्री राधारानी की अष्टसखियों में प्रधान ललिता सखी के अवतार रसिक संत संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदासजी महाराज की यह साधना स्थली है।
लगभग 1500 ई.(1480-1575) मे स्वामी श्री हरिदास जी का आगमन हुआ था, जिनका प्राकट्य वृंदावन के निकट राजपुर मे अपने ननिहाल मे हुआ था।
स्वामी जी वृंदावन मे आने वाले सर्वप्रथम महापुरुष थे। स्वामी जी ने ही वृंदावन को स्थापित किया था । बादशाह अकबर (1573ई.) स्वामीजी के शिष्य तानसेन के साथ उनके दर्शनार्थ आया था।

यह स्थान इतनी धार्मिक और प्रासंगिक मान्यताओं से भरा है कि जो इस स्थान पर जाता इनकी कहानियों में रमता जाता। भारत में अनेक वन है परंतु निधिवन ऐसा वन है जहां मनुष्य तो मनुष्य देवता भी वास करने के लिए आतुर रहते हैं। इस वन की सुंदरता, पवित्रता बस कान्हा के नाम पर आधारित है।

यहां स्थित वृक्ष नृत्य करते हुए प्रतीत होते हैं-

देखा जाये तो निधिवन ही वास्तविक वृंदावन है।
लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खास बात यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं हैं तथा इन वृक्षों को देखने पर डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत होती हैं।

यहाँ इतने विशाल तुलसी के वृक्ष पाए जाते हैं। वन में बिना किसी जल स्रोत एवं जड़ के यह वृक्ष मजबूती के साथ स्थित हैं। इन पेड़ों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे ये एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर नृत्य कर रहे हों। मान्यता यह भी है की श्री कृष्ण की सखियां ही तुलसी की वृक्ष हैं। इतना विशाल तुलसी वन पुरे देश में अन्यत्र कहीं भी नहीं पाया गया है।
इस स्थान पर हमारे प्रिय कान्हा ने ना जाने कितनी रास लीलाएं की है, जिनका जीवित उदाहरण है निधिवनराज।

यहीं भगवान अपनी राधा रानी से मिलने आते और रासलीला करते थे। कहा यह भी जाता है की रास लीला के बाद कान्हा वन में स्थित रंगमहल मंदिर में विश्राम करने जाते थे।

आज भी निधिवन में होता है महारास-

कहते हैं कि आज भी श्री कृष्ण रात्रि के पहर में इस वन में अपनी गोपियों के संग रास रचाते हैं। वन में जितने तुलसी के पेड़ हैं सभी रात्रि में गोपियों का रूप धारण कर लेते और कान्हा के साथ महारास करते हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंग महल में विश्राम करते हैं।

आज भी हमारे लड्डू गोपाल के लिए माखन मिश्री का भोग लगाया जाता, उनका बिस्तर लगाया जाता है।

प्रातः काल जब मंदिर खोला जाता तो वह बिस्तर इतना अस्त व्यस्त रहता है मानो जैसे किसी ने वहां सच में विश्राम किया हो। मंदिर में रखी दातून भी गीली मिलती है और वहां का सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो।

कितना दुर्लभ है ना यहसब, निधिवन में 16108 वृक्ष हैं, सभी
वृक्ष एक दूसरे के साथ जोड़े में स्थित हैं। जोड़े में जो वृक्ष हैं वह किसी ना किसी नृत्य मुद्रा में स्थित हैं। इस वन में कुछ ऐसे वृक्ष हैं जिनकी जड़ें खोखली हो गईं है परंतु वो आज भी उसी प्रकार खड़ी हैं। उन पेड़ों पर अनेक पक्षियों का घर है, अनेक बन्दर वहां रहते जो उन पेड़ों पर लटकते हैं। शाम तक वहां के प्रांगण में कान्हा भजन चलता रहता और भक्तजन नृत्य करते रहते। समूचा वातावरण कृष्ण की भक्ति में सराबोर रहता।

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महारास देखना निषेध है-

कहा जाता अगर कोई व्यक्ति उस महारास को देख ले तो उसके सुनने और देखने की शक्ति शून्य हो जाती।, उस महारास से ऐसा अलौकिक तेज प्रकाश निकलता की देखने वाला उस दृश्य को देखने के बाद इस संसार के सारे मोह माया से दूर हो जाता। इस दुनियां से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता। जो लोग उस दृश्य को देखने के बाद सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाते, वो वैकुण्ठ को प्रस्थान कर जाते, अतः उनकी समाधियां परिसर में ही बना दी जाती हैं।

जब आप निधिवन जाएंगे तो वहां शाम से पहले जाएँ क्योंकि सँध्या काल में निधिवन में प्रवेश निषेध है। निधिवन को संध्या आरती के पश्चात बंद कर दिया जाता है। सँध्या काल के बाद वहां कोई नहीं रहता, पंडित, पुजारी, यहाँ तक की निधिवन में दिन में रहने वाले पशु-पक्षी भी संध्या होते ही निधि वन से चले जाते हैं। दिन भर आने जाने वाले लोगों का मार्ग रोकने वाले बन्दर भी संध्या होते होते वहां से चले जाते ।

ऐसी एक घटना हुई थी 10 वर्ष पूर्व जिसमें एक व्यक्ति जो की जयपुर से आया था वह रास लीला देखने के लिए निधिवन में छुपकर बैठ गया। जब सुबह निधि वन के गेट खोला गया तो वह बेहोश अवस्था में मिला, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया था। ऐसे अनेकों किस्से यहाँ के लोग बताते है।

दूसरी एक घटना जिसमे एक बाबा थे जो कृष्ण के अनन्य भक्त थे उनकी समाधि निधि वन में बनी हुई है। उनके बारे में बताया जाता है की उन्होंने एक बार निधि वन में रास लीला देखने की कोशिश की जिसके फलस्वरूप उनकी मानसिक सन्तुलन बिगड़ गया। लेकिन वो कृष्ण के अनन्य भक्त थे इसलिए उनकी मृत्यु के पश्चात मंदिर कमेटी ने निधि वन में ही उनकी समाधि बनवा दी।

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आसपास के घरों में खिड़कियां नहीं है-

वन के आसपास बने हुए घरों में खिड़कियां नहीं पाई जाती हैं। आसपास रहने वाले निवासी बताते हैं कि शाम सात बजे के बाद कोई इस वन की तरफ ना देखता है ना जाता है। कुछ लोगों ने देखने का प्रयास भी किया तो या तो वो अंधे हो गए या फिर उनके ऊपर कोई ना कोई दैवी आपदा आ गई।

जिन मकानों में खिड़कियां हैं भी, उनके घर के लोग शाम सात बजे मंदिर की आरती का घंटा बजते ही खिड़कियां बंद कर लेते हैं। कुछ लोगों ने तो अपनी खिड़कियों को ईंटों से बंद भी करा दिया है।

वास्तु दृष्टि से निधिवन का रहस्य-

अगर इसी रहस्य को हम वास्तु दृष्टि से देखें तो कहा जाता है कि निधिवन का वास्तु ही ऐसा है कि यह वन रहस्यमयी लगता है। लोगों में केवल भ्रम कि स्थिति पैदा करने के लिए ऐसा बताया जाता की यहाँ अर्धरात्रि में महारास होता जबकि अनियमित आकार के निधिवन के चारों तरफ पक्की चारदीवारी है, और इस परिसर का मुख्यद्वार पश्चिम दिशा में है, और साथ ही इस परिसर का नैऋत्य कोण बढ़ा हुआ है और पूर्व दिशा तथा पूर्व ईशान कोण भी दबा हुआ है।

वास्तु के अनुसार जिस स्थान पर नैऋत्य कोण इस स्थिति में होता है वहां इस प्रकार का भ्रम और छल आसानी से निर्मित हो जाता है। 

निधिवन में 16000 वृक्ष होने की बात बताई गई है, परन्तु देखा जाये तो परिसर का आकार इतना छोटा है कि 1600 वृक्ष भी मुश्किल से  होंगे और कम ऊँचाई के वृक्षों की शाखाएं इतनी मोटी एवं एवं मजबूत नहीं होती हैं कि दिन में वहां दिखाई देने वाले बंदर रात्रि में इन पेड़ों पर विश्राम कर सकें और इसी कारण वह रात्रि को यहाँ से चले जाते हैं।

निधिवन का वास्तु ही वहां भ्रम की स्थिति उत्तपन्न करता या सच में श्री कृष्ण अपनी राधा रानी के साथ महारास करते इसका पता आप वहां जा के ही जान सकते। परन्तु सनातन धर्म में अटूट विश्वास रखने वाले तो यही मानते की आज भी प्रभु आते हैं, क्योंकि कान्हा का वृन्दावन से अटूट प्रेम झुठलाया नहीं जा सकता। राधा रानी और कान्हा की लीला का प्रमाण देखना है तो एक बार अवश्य वृन्दावन की गलियों में जाइये। गली गली में आपको कान्हा के होने का एक सुखद अनुभव होगा।  राधा-कृष्ण के उस अटूट प्रेम को आप महसूस कर पाएंगे जो आपने बस सुना है, क्योंकि,

कान्हा सा सच्चा ना प्रेम कोई,

ना राधा सा सच्चा समर्पण किसी का,

जुड़ गए मन, पर भाग ना जुड़े,

हो कर अलग, पर कभी अलग ना हुए।

कृष्ण ने भी कहा था मुझे पाना है तो राधा नाम लो, इसीलिए आज भी पहले नाम राधारानी का लेते उसके पश्चात श्रीकृष्ण का।

तो प्रेम से बोलिये राधे- राधे ( राह दे)।

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धन्यवाद

पारुल त्रिपाठी

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